आरक्षण व्यवस्थाः प्रारम्भ और विकास
आरक्षण व्यवस्था भारतीय इतिहास के लिए कोई नई बात नहीं है। यदि देखा जाए तो इस देश में दो तरह की आरक्षण व्यवस्थाएं अस्तित्व में हैं। एक आरक्षण व्यवस्था तो वह है जो देश में संविधान लागू होने के साथ संविधान में इसका प्रावधान होने के कारण है जिसके बारे में प्राय: चर्चा होती रहती है, लेकिन एक आरक्षण व्यवस्था इस देश में आर्यों के आगमन के बाद इस देश में आर्यों की सत्ता स्थापित होने के बाद वर्णव्यवस्था के रूप में अस्तित्व में आयी। यह वर्णव्यवस्था जो कि आरक्षण व्यवस्था का ही दूसरा नाम थी, विदेशी आर्य शासकों की गहरी कुटिल सोच का परिणाम थी। आर्य जानते थे कि वे सामान्य तरीके से यहां के मूलनिवासियों पर शासन करने में सफल नहीं होगें। उन्हें लगातार अनेक शक्तिशाली मूलनिवासी शासकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा था, उनसे संघर्ष करना पड़ रहा था। इसलिए वे इस देश में ऐसी व्यवस्था लागू करना चाहते थे जिससे यहां के मूलनिवासी समाज का विरोध तो समाप्त हो ही, साथ ही लम्बे समय तक उन पर इस प्रकार शासन किया जा सके और भविष्य में कभी भी मूलनिवासयों के विरोध की सम्भावना न रहे। इसके लिए वर्णव्यवस्था का प्रारम्भ भारत में किया गया। आर्यों ने स्वयं को तीन वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को बांटा और समाज की सारी शक्तियों को अपने पास रखने के लिए उन्हें इन तीन वर्णों में बांट दिया। पढ़ना-पढ़ाना, दान लेना, यज्ञ कराना ब्राह्मण के लिए और रक्षा व शासन करने का अधिकार क्षत्रियों के लिए आरक्षित किया गया। इसी प्रकार व्यापार करने का अधिकार वैश्य को दिया गया। इस देश के मूलनिवासियों में से जो लोग आर्यों के सामने समर्पण कर चुके थे, उन्हें गुलाम अर्थात् शूद्र वर्ण में रखा गया और उनके लिए सेवा करने का कार्य आरक्षित किया गया। मूलनिवासियों के जिस वर्ग ने आर्यों के सम्मुख सरलता से समर्पण नहीं किया, आर्यों को लम्बे समय तक परेशान किया, ऐसे लोगों को वर्णव्यवस्था से बाहर रखकर गांव की सीमा पर रहने को कहा गया और गन्दे व घृणित कार्यों का आरक्षण इस वर्ग के लिए कर दिया गया। बाद में आर्यों ने मूलनिवासियों की एकता की सम्भावना को पूरी तरह समाप्त करने के लिए सारे मूलनिवासी समाज को कार्य के आधार पर अनेक जातियों में बांट के उनके बीच भेदभाव पैदा कर दिया। आर्यों द्वारा लागू की गयी वर्णव्यवस्था रूपी आरक्षण व्यवस्था के प्रतियुत्तर में वर्तमान आरक्षण व्ययवस्था का प्रारम्भ हुआ है। आर्यों की जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था ने समाज में इतनी विषमता पैदा कर दी कि मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव की ऐसी दीवार बन गयी जिसे तोड़ना मनुष्य के हाथ में न रहा क्योंकि धर्म के ठेकेदारों ने इस आरक्षण व्यवस्था को ईश्वरीय अर्थात् ईश्वर द्वारा रचित घोषित कर दिया था। आर्यों की आरक्षाण व्यवस्था और वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में अन्तर यह है कि आर्यों की आरक्षण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को आरक्षण व्यवस्था को मानना पड़ता था क्योंकि आरक्षण व्यवस्था का उल्लघंन करने पर अर्थात् अपनी जाति के स्थान पर किसी दूसरी जाति के कार्य को करने पर कड़े दण्ड का प्रावधान था, लेकिन वर्तमान आरक्षण व्यवस्था कार्यों के ऊपर आधारित नहीं है। कोई भी व्यक्ति कोई सा भी कार्य करने के लिए स्वतंत्र है और इसलिए दण्ड का प्रश्न ही नहीं उठता। पुरानी आरक्षण व्यवस्था ने जहां इस देश के बहुसंख्यक मूलनिवासियों को गुलामी की जिन्दगी दी, यहां तक कि कुछ को तो पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को विवश किया और अल्पसंख्यक आर्यों को संसार के सारे सुख भोगने का अवसर प्रदान किया, वहीं वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में पुरानी आरक्षण व्यवस्था के कारण शोषण का शिकार रहे वर्ग को विकास की मुख्य धारा में लाकर समाज का समग्र विकास करने का प्रयास किया जा रहा है। वास्तव में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था पुरानी आरक्षण व्यवस्था अर्थात् वर्णव्यवस्था के प्रभाव को समाप्त करने के लिए ही अस्तित्व में आयी है। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था वर्णव्यवस्था रूपी आरक्षण का इलाज है। जहर को जहर ही मारता है। यदि आर्यों ने जाति पर आधारित आरक्षण व्यवस्था इस देश में न लागू की होती तो वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की आवश्यकता नही न पड़ती। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का प्रारम्भ और विकास: वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का इतिहास कोल्हापुर के शासक शाहू जी महाराज के आदेश के साथ प्रारम्भ होता है। उन्होंने 26 जलाई, 1902 को एक आदेश के द्वारा अपनी रियासत में सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिए।[1] 1902 में राजा एडवर्ड तृतीय के राज्यभिषेक के अवसर पर शाहू जी महाराज को इंग्लैंड आने का निमंत्रण मिला। इंग्लैंड में प्रवास के दौरान उन्होंने वहीं से आदेश जारी किया कि राज्य में नौकरियों में 50 प्रतिशत पद तत्काल प्रभाव से पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित की जाएं। इन पिछड़ी जातियों में ब्राह्मण, प्रभु, सैन्वी, पारसी व अन्य अगड़ी जातियों को छोड़कर अन्य सभी जातियाँ शामिल थीं। उन्होंने इस आरक्षण के आदेश का ठीक से पालन न करने पर दण्ड का भी प्रावधान किया। भारतीय इतिहास में यह पहली ऐसी घटना थी जिसमें आर्यों की आरक्षण व्यवस्था के विपरीत जाकर इस देश के मूलनिवासियों को लाभ पहुँचाने वाली आरक्षण व्यवस्था देश के ही किसी भाग में लागू की गयी। इसी समय दक्षिण में मद्रास प्रान्त में भी पश्चिमी शिक्षा के प्रसार ने वहां के गैर ब्राह्मणों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना आ रही थी। पूरे प्रान्त में सभी पदों पर ब्राह्मणों का कब्जा था। इस स्थिति के विरूद्ध गैर-ब्राह्मणों में रोष बढ़ता जा रहा था और कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन व आन्दोलन हो रहे थे। गैर-ब्राह्मण आन्दोलन के बढ़ने पर 1918 में मैसूर के महाराजा ने एक आयोग का गठन किया जो अपने तरह का पहला था।[2] इस आयोग को राज्य की नौकरियों में पिछड़ी जातियों के उचित प्रतिनिधित्व के लिए उपाय व सिफारिशें देने को कहा गया। 1921 में मद्रास सरकार ने राज्य की नौकरियों में गैर-ब्राह्मणों के लिए अधिकतम प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाया।[3] बाद में 1927 में इस व्यवस्था का विस्तार कर राज्य की समस्त जनता को पांच वर्गों में बांटकर प्रत्येक वर्ग के लिए पृथक कोटा निश्चित कर दिया गया।[4] इसी प्रकार 1925 में बम्बई प्रान्त की सरकार ने एक प्रस्ताव पारित
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